
चौधरी साहब के दादा एक ज़माने में दारोग़ा थे, बढ़िया आमदनी थी, ठाठ थे. उनके दो बेटे हुए फिर दोनों बेटों के बच्चे. जब ये बच्चे बड़े हुए तब तक चौधरी खानदान के पास न तो खानदानी दौलत बची थी और न ही रईसी... लेकिन पीरबख्श ने अपने दादा के वक्त की इज़्ज़त को ढोल में पोल बना रखा था. घर के अंदर भले सब फटे हाल थे लेकिन दरवाज़े पर ऐसा रेशमी पर्दा लटकाया था कि लगता था बड़ी शान वाले लोग हैं - सुनिए यशपाल की लिखी कहानी 'पर्दा' स्टोरीबॉक्स में जमशेद क़मर सिद्दीक़ी से.
साउंद मिक्सिंग : सूरज सिंह









