
मांसाहार और शाकाहार की बहस सिर्फ़ थाली तक सीमित नहीं है. इसके पीछे धर्म, पहचान, जाति, अहिंसा, पर्यावरण, कृषि, बाज़ार और नैतिकता के कई सवाल जुड़े हैं. हम क्या खाते हैं, क्यों खाते हैं और अपने खाने के आधार पर दूसरों को कैसे देखते हैं. क्या मांस खाना हिंसा है? क्या शाकाहारी होना ही अहिंसक होने की गारंटी है? क्या अहिंसा केवल हमारी थाली तक सीमित हो सकती है? और अगर प्रकृति में जीवन एक-दूसरे पर निर्भर है, तो हिंसा और अहिंसा को हम कैसे समझें?
इस एपिसोड में बात मांसाहार और शाकाहार से आगे जाकर भोजन, उपभोक्तावाद, कृषि, मीट एक्सपोर्ट, पर्यावरण और गांधी की अहिंसा तक पहुंचती है. असली सवाल यह है कि हमारी थाली बदलने से अहिंसा आती है या हमारे व्यवहार और सोच बदलने से? क्या हिंसा सिर्फ़ वहां है जहां खून दिखाई देता है? क्या प्रकृति करुणा से चलती है या संतुलन से? थाली में क्या है, यह सवाल कब से इतना बड़ा हो गया कि उससे इंसान की पहचान तय होने लगी? 'बाबामंडल' में इन्हीं सवालों की पड़ताल पाणिनि आनंद बाबा के साथ.
प्रड्यूसर: कुमार केशव
साउंड मिक्सिंग: सूरज सिंह