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स्टूपिड और बेवक़ूफ़ का फ़र्क़, दिवाली सफ़ाई के टिप्स और कम्युनिस्ट चोर का क़िस्सा : तीन ताल, Ep 55

स्टूपिड और बेवक़ूफ़ का फ़र्क़, दिवाली सफ़ाई के टिप्स और कम्युनिस्ट चोर का क़िस्सा : तीन ताल, Ep 55

तीन ताल के 55वें एपिसोड में कमलेश 'ताऊ', पाणिनि ‘बाबा’ और कुलदीप ‘सरदार' से सुनिए:

-ठंड की आमद के साथ सरदार को क्यों याद आये बाबा अमीर खुसरो. स्टोव की पिन का मेटाफर और उसको इस्तेमाल करने की दक्षता.

-फेसबुक के नाम बदलने के पीछे की मंशा. ये एक तैयारी या साज़िश? ताऊ ने क्यों कहा कि 'मेटा भाई' को अमेरिका का राष्ट्रपति होने की ज़रूरत नहीं, 

-क्या भकचोन्हर गाली है? ताऊ और बाबा ने बताया इसका असल मतलब. स्टुपिड और बेवक़ूफ़ में फ़र्क़ 

-लालू प्रसाद यादव का फोनेटिक जस्टिस और आँचलिक शब्दों का इस्तेमाल. क्या हो जब सम्मानजनक वाक्य में अचानक अपमान लाया जाए.

-सफाई क्यों ज़रूरी है और उसका सही तरीका क्या. कैसे उत्तर भारत में सफाई 'प्रोसेस इज द पनिशमेंट' बन गया है.

-ताऊ और बाबा को सफाई करते हुए यूँ ही क्या मिला.
सफाई के दोरान बाबा को दिक्कत काय बात की और पेपरबैक किताब लें या सजिल्द? 

-सफाई के दौरान मिले ख़त-ओ-किताबत की बात. सरदार को जब स्वरचित वीर रस की कविताएँ मिलीं तो उनकी पत्नी ने क्या कहा. 

-चूने की पुताई की ख़ुशबू और उसे खाने का आनन्द और ताऊ ने क्यों दी कबाड़ को फेंकने की सलाह.

-हमनामों से हमारा गुमनाम रिश्ता क्या है? ताऊ को क्यों एक वक़्त के बाद 'कमलेश' नाम से परेशानी होने लगी और बाबा का 'पाणिनि' प्रेम.

-बिज़ार ख़बर में उस चोर के किस्से जिससे हिंदुस्तान के कई लीडर सीख सकते हैं.

-और आख़िर में तीन तालियों की चिट्ठियाँ. इस पर बात कि क्या स्वार्थी हुए बिना सुखी रहा जा सकता है?

प्रड्यूसर ~ शुभम तिवारी
साउंड मिक्सिंग ~ अमृत रेगी

 

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